Thursday, April 9, 2026

शाम का समय

कल का दिन वैसे तो आम दिनों जैसा ही बोरिंग बीता, पर शाम पूरी तरह दिलचस्प थी। कभी-कभी वाकई ब्लेस्ड फील करती हूँ कि मैं लड़की हूँ, क्योंकि हरकतें ही ऐसी होती हैं। पहले मुझे लगा कि वह पूर्वोत्तर भारत से है। उसे देखा, शायद बीस सेकंड से ज्यादा देखा होगा। वह मुस्कुराया, और मैं थोड़ा घूरते हुए वहीं रह गई। फिर मेरे घूरने को तोड़ते हुए जिनू ने “हैलो” कहा। मैंने हैलो नहीं कहा, बस पूछा, “मणिपुर और मिजोरम?” उसने अपनी मुस्कुराहट को हंसी में बदलकर कहा, “साउथ कोरिया।” 

अच्छा तुम वही हो… खुशी तुम्हारे ही बारे में बात करती है । दूसरे ही क्षण याद आया, खुशी बीटीएस के बारे में बात करती है यार… (यह सब सिर्फ सोचा) .

ओह…! “आप पढ़ाई कर रहे हैं?” मैंने पूछा। जिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, मेरा रेस्टॉरेंट है।” “ओह कहाँ?” मैंने उत्सुक होकर पूछा। लाजपत, दिल्ली… सियोल कैफे। फिर आधा उत्साहित, आधा मोहित, उसका नंबर लिया और कहा, “हम आपके रेस्टॉरेंट आएंगे।” उसने हंसते हुए कहा, “या श्योर।”

इतने में एक कदम आगे फोन में नंबर सेव करते निकल ही रही थी कि अचानक मुड़ी और पूछा, “वैसे हैलो को कोरिया में क्या कहते हैं?” पूछते वक्त और रिप्लाई आने के मध्य खुद के अंदर से जवाब आया, “गूगल कर ले बहन,” फिर सामने से आवाज़ आई- अन्न्योंग हसेयो! (याद नहीं है, गूगल किया है)क्या??? मैंने दुबारा पूछा।उसने दुबारा बताया। तीसरी बार जाकर तो सुन पाई, फिर समझ आया कि जो चीजें जिसे हम नहीं जानते, न तो उन्हें देख पाते हैं ना सुन पाते हैं…।आगे, हमने पाँच बार साथ में अभ्यास किया। छठी बार में जिनू को जरूर अपना रेस्टॉरेंट याद आया होगा, उसने  कहा, “या साउंड सिमिलर…” 

हम दोनों हँस पड़े। खैर, हमारी हँसी की भाषा एक ही थी। 

खैर, सियोल रेस्टॉरेंट के साथ सियोल बेकरी (आइज़ॉल) और बेकरी में लगाए चक्कर भी याद आए।

अब सवाल यह है कि रेस्टॉरेंट का नाम ‘सियोल’ क्यों है? क्या वे साउथ कोरिया के सियोल सिटी से है? हो सकता है। फिर कभी मिलने का मौका मिला तो ज़रूर पूछूंगी, और यह भी कि उसने भारत ही क्यों चुना। और हाँ, बात करें जिनू के नाम की। तो उसका पूरा नाम ‘ओह जिनू’ है, जिसमें ‘ओह’ सरनेम है और ‘जिनू’ पहला नाम। जिनू का मतलब है “वह व्यक्ति जो परिवार की संपत्ति और समृद्धि को आगे बढ़ाए।” जो कि जिनू कर रहें हैं।  

और इस तरह हमें अपने इर्द-गिर्द के बच्चों के लिए कुछ नए नाम मिले।

Monday, February 16, 2026

२८ नव. की रात

कई दिनों से मन उदास है शायद इसकी वजह कुंतल की कहानी हो जिसे अभी पूरा पढ़ा  है। उपन्यास पढ़ते वक़्त बहुत जरूरी होता है यह पता होना की यह कहानी सृजनात्मकता की उपज है या सच्चाई की । चूंकि कांता भारती की  गूगल पर और कोई किताब नहीं मिल रही । साहित्य कहता है यह उनके अनुभव हैं और सच हैं । एक बार फिर मन डर जाता है, उदास हो जाता है ।

कांता भारती का उपन्यास “रेत की मछली” हिंदी साहित्य की उस परंपरा से कटकर आता है, जहाँ कहानियाँ मनोरंजन नहीं, जीवन की उघड़ी हुई परतें होती हैं। यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार यह एहसास होता है यह कहानी नहीं लिखी गई थी, यह कहानी थी, जो भीतर से फूट पड़ी। यह वह कथा है जिसे कहा जाना ज़रूरी था, और शायद लंबे समय तक दबा कर रखा गया था।

कुंतल, इस उपन्यास की केंद्रीय नायिका है , वह धीरे-धीरे कब परिधीय हो जाती है यह उसे होने के बाद पता चलता है और यह प्रक्रिया ना सिर्फ उसे बल्कि पाठक वर्ग को द्रवित करता  है... कुंतल वह पात्र नहीं है जो आदर्श के खाँचे में फिट होती है। वह उस स्त्री की प्रतिनिधि है जो पढ़ी-लिखी है, समझदार है, प्रेम में विश्वास करती है, पर समय के साथ रिश्तों की असलियत में अपनी अस्मिता तक गँवा देती है। कुंतल की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि उसे धोखा मिला, बल्कि यह है कि उसने खुद से कभी सवाल नहीं किए। वह चुप रही, सहती रही, रिश्तों की दरकती दीवारों के नीचे अपना स्वाभिमान रखकर बैठी रही और धीरे-धीरे खुद को ही खोती चली गई।

लेकिन यह उपन्यास कुंतल को बेबस दिखाकर सहानुभूति कमाने की कोशिश नहीं करता। बल्कि एक कड़वा, ईमानदार सच दिखाता है  कि जब तक कोई स्त्री अपने आत्म-सम्मान के लिए नहीं खड़ी होती, तब तक दुनिया हर भावनात्मक ज़ख्म को 'कर्तव्य' का नाम दे ही देती है।

शोभन, इस कथा का सबसे गूढ़ पुरुष पात्र है। एक ऐसा व्यक्ति जो संवेदनशील भी है, और बेईमान भी। उसके भीतर भावनाओं की गहराई भी है, और रिश्तों से खेलने की कायरता भी। किताब में पत्र संवाद के बीच एक पंक्ति है , “अकेलापन अब महसूस होता है..." यानी जब आपने साथ को महसूस किया हो, तभी अकेलेपन की असल तासीर समझ में आती है। यह एक अकेले व्यक्ति की नहीं, छूट गए रिश्तों की सामूहिक तड़प है। लेकिन शोभन की यह उदासी, उसकी संवेदनशीलता उसे पूरी तरह निर्दोष नहीं बनाती, जो कुछ वह करता है वो धोखा है, चाहे वह प्रेम के नाम पर हो या फिर भावनात्मक पलायन के नाम पर

और फिर आती है - मीनल , शायद इस उपन्यास की सबसे कठिन गुत्थी। एक स्त्री, जो स्त्रीत्व को सहानुभूति में नहीं, बल्कि हथियार की तरह इस्तेमाल करती है। उसके भीतर अधूरी इच्छाएँ हैं, असुरक्षा है, और क्रूरता भी। मीनल वह चेहरा है जो एक औरत होकर दूसरी औरत को तोड़ता है। पाठक कभी उसे समझने की कोशिश करता है, कभी उससे नफ़रत करने लगता है, और अंत में, उसके हिस्से घृणा और दया, दोनों ही बचते हैं।

"रेत की मछली" की खास बात यह है कि यह तेज़ गति वाली कथा नहीं है - यह धीमे ज़हर की तरह है। इसका पहला हिस्सा एक लंबी, चुप यात्रा जैसा है, जिसमें पाठक को धैर्य रखना पड़ता है। लेकिन वही धीमापन, वही बुनाई जरूरी थी- क्योंकि यही वह जगह है जहाँ कुंतल की खामोशी गूँजती है। और फिर दूसरे भाग में, जैसे बरसों से दबे हुए सवाल, अहसास और घाव एक-एक करके फटते हैं। “रेत की मछली”  एक स्त्री के भीतर की आवाज़ जो अफना कर थक चुकी है, पर अब भी पूरी तरह मरी नहीं है।।

“रेत की मछली” को पढ़ना, दरअसल, एक ऐसा अनुभव है जहाँ पाठक का दिल कई बार भारी, आँखें नाम और कालेजा फटने को होता है। न सिर्फ इसलिए कि कुंतल टूटी है, बल्कि इसलिए भी कि वह टूटती रही और किसी ने रोका नहीं, यहाँ तक कि उसने खुद भी नहीं।

यह उपन्यास साहित्य नहीं, एक स्त्री का बयान-ए-हकीकत है। ऐसा लेखन जो कहता नहीं, बस एक आईना रख देता है और पाठक उसमें अपना ही कोई छिपा चेहरा देख लेता है।

हिंदी साहित्य में ऐसी किताबें कम दिखती हैं, तो इसकी वजह यह नहीं कि ऐसी कहानियाँ नहीं होतीं  बल्कि यह है कि अधिकतर स्त्रियाँ अब भी लिखने से पहले टूटने से डरती हैं। कांता भारती ने न सिर्फ लिखा, बल्कि उस
असहनीय चुप्पी को शब्द दिए हैं, लिखने के दौरान उन सारी पीड़ाओं को एक बार फिर से जिया है ...


Friday, February 13, 2026

१३ फरवरी की शाम...

अभी ट्रेनिंग चल रही है। कल की ट्रेनिंग पूरी कर मेट्रो ही लिया था कि रूमी का फ़ोन आया कि आज आते वक़्त सब्ज़ियाँ लेते आना।

"ठीक है..." इतना मैंने ना सिर्फ कहा, बल्कि सुना भी। कभी- कभी स्वयं को सुनना आश्चर्य में भी डालता है... कहां पापा के साथ सब्ज़ी लेने जाना होता था । वह जब तक सब्ज़ी लेते तब तक गोलगप्पे और आलू टिक्की निपटाए जाते...क्या मस्त दिन थे। 

ख़ैर... लाजपत मेट्रो स्टेशन से घर तक का रास्ता कानों में ब्लूटूथ डाले पार हो ही रहा था कि सब्ज़ी का ठेला दिखा। एक किलो मटर, आधा किलो से अधिक की गोभी, मम्मी को याद करते हुए पाव भर चुकंदर, क्रयता की परम्परा बनाये रखते थोड़ी सी धनिया।

 ग्राहक को हमेशा लगता है कि धनिये का दाम उसने सब्ज़ियों के दाम में ही चुका दिया है पर हर सब्ज़ीवाले को चुटकी भर धनिया ने दुनिया का सबसे दिलदार आदमी बनने का मौका दिया है और देता रहेगा। यह धनिया ही है जिसकी वजह से सब्ज़ियों को ठेले से लेने की अभिप्रेरणा बनी रहेगी।

कल सड़क पर ना जाने कितने तरीके के शोर थे पर वह सारे शोर सामान्य व परिचित थे। सब्ज़ीवाले ने दाम बताया साफ सुनने के लिए ब्लूटूथ हटाना पड़ा।  यह कैसी आवाज़ जो पीठ से होते हुए कानों में चढ़ रही थी।  हम दोनों साथ मुड़े, ना उसने दाम बताया ना मैंने पूछा।  हमदोनों साथ में एक दिशा में बढ़े। जहाँ जाना हमदोनों को बड़ा गैरज़रूरी लग रहा था पर दोनों गए।

दो बड़े आदमी एक छोटा आदमी ऊँची आवाज में बात करते करते लड़ रहे है...लड़ते-लड़ते बड़े आदमी ने हाथ छोटे आदमी के ऊपर हाथ उठा दिया । हाथ उठाना हमें क्रियाशील बनाने की शायद एक वजह रही हो।  छोटा आदमी सब्ज़ीवाले के ही बिरादरी का था।  अभी इतना ही पता चल पाया था।  वहां सिर्फ बड़ा आदमी चिल्ला रहा था और जब चिल्लाना कम लगने लगे तो वह उसे थप्पड़ मार  रहा था। अब हम दो और वो तीन, कुल पांच लोग थे।  

मुँह से सहसा बात फूटी, "आप मार नहीं सकते। मेरे सामने तो कत्तई नहीं। मैं मीडिया से हूँ।" 

वह आदमी कपड़ो से वकील जान पड़ता था उसने जब बोला - "मैंने थप्पड़ कहा मारा, जाइये  आप अपना काम करिये।" 

और फिर उसने डांटना चालू रखा। तब तक  यह बात तय हो चुकी थी  कि  वह वकील ही है। साथ वाले दूसरे रसूखदार ने बताया कि वो थप्पड़ नहीं मार रहा, वो खिन्न है। खिन्नता का कारण पूछने पर बताया कि हमने इसे कितनी बार  मना किया कि यह पॉश इलाका है, सामने गटेड सोसाइटी है, यहाँ सड़क के किनारे गाड़ियां पार्क होती है। 

 "एमसीडी ने कितनी बार इनको मना किया है... ये मानता ही नहीं है।"  "फिर भी... हाथ  उठाना..." "मैडम चलिए छोड़िये..."

चूँकि मैडम को भी ज्यादे पड़ी नहीं थी तो उन्होंने भी छोड़ दिया। सब्ज़ी के पैसे पे किये। इस बीच सब्ज़ीवाले ने बताया फलां आदमी सुप्रीम कोर्ट में वकील है। और उसका पसंदीदा ग्राहक  भी, वो  सामने वाले कॉलोनी में रहते हैं।  उन्होंने कई बार इसको मना किया है। पर यह भी अड़ियल है।

 "पर... आपने भी तो लगाया है वो आपको तो नहीं बोल रहे।"

 "उनसे कुछ व्यक्तिगत है क्या ?..." 

"नहीं, क्या ही होगा... हालाँकि कि यहाँ ठेले लगाने के लिए पहले पूछना पड़ता है।"

 "अच्छा।" "किससे ?"  

"कॉलोनी वाले लोगो से वो अगर इजाज़त दे तो लगा सकते हैं..." "क्या? सच में ! लेकिन यह सड़क तो कॉलोनी के अंदर नहीं चौराहे पर है ..." "हम्म।" 

"आपको कैसे मिली इजाज़त ?" 

"मेरा परिचय था... एमसीडी का मेन आदमी फला भइया मेरा परिचित हैं।" 

"अच्छा...पैसे भी देने होते हैं ?"

"नहीं नहीं...कोई  पैसा नहीं।" "ओह!!!..."

इतने में सब्जी का थैला आँखों के सामने लटका दिया। थैला थामते एक बार फिर हम दोनों ने उस फल वाले को देखा। वो दोनों उसे धमकाते हुए कॉलोनी के अंदर जाने वाले ही थे पलटकर उसने बोला -

"बात जो भी हो आपने मुझे मारा कैसे ? आप मुझे मार नहीं सकते आपने गलत किया है।" 

"मैंने मारा ही नहीं ... तू अपनी कल दुकान नहीं लगाएगा, लगाई तो फिर बताऊंगा।"  

धीरे धीरे वह आवाज़ मद्धम होते होते गायब हो गई। 

ख़ैर फिर सुबह हुई, ट्रेनिंग की एक और सुबह, रास्ता ऑफिस का वही था। ऑफिस आते वक़्त लाजपत के सड़को पर खड़ी बंद गाड़ियों ने थोड़ी आवाज़ की। अनदेखी की कोशिश में सुप्रीम कोर्ट वाले रस्ते में ट्रैफिक का मिलना अब सामान्य सी बात है। कोर्ट के बाहर सड़क की चौड़ाई अच्छी है तभी तो तमाम गाड़िया सड़कों पर पार्क कर दी जाती हैं बीस तीस मिनट लगते हैं तो क्या जैसे तैसे वह रास्ता भी पार तो हो ही जाता है।  ख़ैर देखो ऑफिस आ गया। अभी फिर पे करना है। अब लिखना बंद करना होगा। 

Tuesday, September 2, 2025

प्रेम पत्र

डिअर प्रिया, 

झप्पी विद पप्पी ...

तुम सोच रही होगी फिर आ गया इसका... लो पकाएगी, मैंने कोशिश पूरी की है देखो! क्या और कौन पकता है । फिलहाल मेरे पास अर्थ की कमी है तो आप इन शब्दों के अर्थो से ही काम दुरुस्त करें । 

कैसी हो ? यह शुरुआती कुछ ऐसी पंक्तियाँ हैं जो हर चिट्ठी में होना आम है । पर इसका जवाब पता रहते हुए भी हर चिट्ठी में इसे लिखा जाना शायद  यह आम ना हो। मैं तुम्हारे हर जन्मदिन पर अपना अंकन चाहती थी चाहे वो ज़िद ही क्यूँ ना हो । पर ये क्या ? इस वर्ष मैंने देखा कि मैं कुछ तुम्हारी तरह बनती जा रही हूँ। थोड़ी नीरस थोड़ी अर्थसंगत । अब देखो न तुम्हारे खास दिन पर मैंने कुछ नहीं दिया। इसलिए यह चिठ्ठी लिख रही हूँ । 

पर मैं अपने इस हरकत को खारिज़ करना चाहूँगी और और कहना चाहूँगी कि कोई काम इसीलिए मत करो की वह तुम्हारे गिल्ट को कम करे या उसे मसले को संतुलित करे। संतुलन आवश्यक है पर वह मुक्त सोच से जन्म हो ना की किसी का मन रखने के लिए । इसीलिए यह लेटर आज लिख रही हूँ मुक्त होकर गिल्ट फ्री हो कर  पाँच जून को। उम्मीद करती हूँ कि तुम मुझे हमेशा की तरह समझोगी ।  

 मैंने देखा फ़ोटोज़ और वीडियोज़ तुम्हारे जन्मदिन के, तुम्हारे दोस्तों के साथ... अच्छा लगा, तुम खुश लगी, मजा आया देख कर ।पर साथ ही ऐसा लगा शायद अब मेरी प्रासंगिकता उतनी रही नहीं । तुम्हारा बातों में आकांक्षा या साज़िदा का बखान... उनके फोन आने पर मेरा कॉल कट कर देना ...मुझे अहसास कराता है कि आईआईएमसी वाले  सही कह रहे थे कि कब तक चिपकी रहोगी?

 पर यकीन मानो मसला असुरक्षा का कत्तई नहीं है तुम तो जानती हो... असुरक्षा जैसी चीज मेरी इर्द गिर्द नहीं होती।  पर मसला है टाइम का, बेफिजूल की बातों का, जो आजकल हो नहीं पा रही । शायद  मेरा ऐसा सोचना यह किसी भी रिश्ते का रेड फ्लैग हो सकता है तो क्या हुआ कि मैं तुम्हारी बहन हूँ । कोई कितना भी करीबी हो रेड फ्लैग पहचानना आना चाहिए। खैर ( ख पे नुक्ता लगा के पढ़ना) बस ऐसे ही कह दिया ।

तुमको शायद पता हो तुम मेरे लिए घर के माफिक हो । कहीं से भी चलूँ लौट के तुम पर ही आना तय है। तुम बिंदास, बेलौस, बेपरवाह टाइप्स हो और ऐसे ही बने रहना । कभी भी खुद को किसी भी मसले में विक्टिम के भांति मत देखना । खुद के स्टोरी में तो हम खुद हीरो हो ही सकते हैं । हम किसी जगह किसलिए जुड़े यह देखना होगा वहाँ से हमें जो चाहिए तो वो मिला या नहीं हमें बस इतना ही देखना होता है और आगे बढ़ना होता है आगे जाने  का रास्ता शायद और दिलचस्प हो... इसलिए मन हो ना हो, भावनाएं साथ दें ना दें, आगे बढ़ना होता है और खुश होकर बढ़ना होता है।

तुम कई लोगों से मिलोगी तुम्हें बताया जाएगा या मालूम होगा कि इट्स ओके टू एक्स्प्रेस ...  फलाना -ढमाका... इन बातों को ज्यादे गंभीरता से नहीं लेना है । भावनाओं को भी ज्यादे गंभीरता से नहीं लेना है इनको कोई क्या ही ले ये खुद बदलती रहती हैं । तो बेहतर है वो करो जो दिमाग कह रहा है और उसमे थोड़ा बहुत मन भी साथ दे रहा है । शाहरुख खान कहते हैं : करना वही होता है जो करना चाहिए । 

यार मैंने हाल ही में अभिनेता पंकज त्रिपाठी की पॉडकास्ट सुनी उसमें वो कह रहे थे कि उन्होंने अपने लाइफ में ऐसा देखा है कि हम जिन चीजों की प्रैक्टिस करते हैं वह चीजें धीरे धीरे हमारी लाइफ में आने लगती हैं । तो हमें मुस्कुराने और खुश रहने की प्रैक्टिस करनी चाहिए । ये बातें कहने में थोड़ी हार्ड लग रही है पर उन्होंने ऐसा ही कहा । पर यकीन मानो यार हमारे लाइफ में वास्तव में चीजें काफी बेहतर है । और मन से मुस्कुराने लायक है अब जब मैंने दिल्ली में नज़र घूमाती हूँ तो यहाँ दिखता है फूटपाथ जो अमूमन छोटे शहरों में नहीं होता पर... कुछ चीजे कॉमन होती है।  तुम समझ गई होगी । 

मैं आईआईएमसी में थी तब वहाँ मुझसे एक बात कही थी किसी ने, आप लोग पत्रकारिता नहीं शौक पूरे करने आए  है क्योंकि पत्रकारिता का जन्म असंतोष और जद्दोजहद में होता है । आज भी यह संवाद बड़ी ही निष्ठुरता  के साथ मेरे जेहन में जगह बनाए हुए है और इसे मैं शायद रखना चाहूँगी । मैं यही कहना चाहती हूँ कि किसी को भी असंतोष और जद्दोजहद की जरूरत किसी भी जगह बेहतर करने के लिए पड़ती ही हैं। तुम अपने काम में इसे सबसे पहले रखना कभी भी तुम्हारा  काम तुम्हें बहुत अच्छा या अंतिम सत्य सा नहीं लगना चाहिए । लोगों से ज्यादे कमी तुम अपने काम में देखो और उसे पारिष्कृत करने  में लगे रहो शायद हम इससे थोड़ा बेहतर हो सके । 

मेरे कमजोर समय में तुम हमेशा मेरे साथ रही हो । यह बात में कई बार शायद तुम्हें बता चुकी हूँ। कहा से आते है ऐसे लोग जो आपके मापदंड को बढ़ा जाए।और फिर कोई भी मिले तो आप सामने से मना ही कर दो।नहीं चाहिए। 

यार मुझे लगता हैं सिनेमा ने हमारा अलग दिमाग खराब कर रखा हैं । फिल्म लंचबॉक्स का संवाद याद है ? " कभी - कभी गलत ट्रेन भी सही जगह पहुंचा देती है। " तो मैं यही कहना चाहती हूँ कि ऐसा नहीं होता है गुरु । गलत ट्रेन अधिकतर गलत स्टेशन पर ही पहुंचाती है जितना जल्दी हो सके उतर जाना चाहिए ज्यादा किराया देने से आप बच जाते है। जो ट्रेन आपको सही जगह पहुंचा रही है वो गलत ट्रेन है ही नहीं, पहले तो ये एक्सेप्ट कीजिए । और अगर मान  लो ऐसा हुआ भी तो ये उनलोगों के साथ हो सकता है जिनको अपने स्टेशन का पता ही ना हो । 

त्रासदी है तुम्हारे साथ मेरी कोई नई यादें नहीं जिन्हे बखूबी लिखा जाए । मैं तुमसे एक बात जो कभी नहीं कही पर तुम्हे हमेशा से जानती रही कि  मैं तुम्हारी बहुत इज़्ज़त करती हूँ और सबसे ज़्यादा सराहती भी हूँ। पर इसका मलतब यह कत्तई  नहीं कि मैं तुम्हें आप और दीदी जैसे शब्दों से प्रताड़ित करने लगूँ । ऐसा नहीं होगा । और आखिरी सबसे महत्व पूर्ण बात कि सबसे पहले खुद को पसंद करो, सबसे पहले खुद की इज्जत करो, खुद को सराहो, खुद को अपनाओ,खुद को प्यार करो। फिर मुझे । शायद यह मुझे यह चीज अपने में भी लानी चाहिए। ये सब गप्पा गोल है मेरे में तो । सबसे इम्पॉर्टन्ट बात कि किसी को ज्ञान नहीं देना चाहिए। लेकिन तुम मुझे देना । मेरे को तो जरूरत है । 

लव यू Moti (दुनिया कुछ भी कहे इसे तुम मोती पढ़ना : चमकदार, अमूल्य, और अनमोल)।


हम भला-बुरा सब भूल चुके, नतमस्तक हो मुख मोड़ चले
अभिशाप उठाकर होठों पर, वरदान दृगों से छोड़ चले ।

अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बन्धे थे और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले। 

हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले ।
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले। 

भगवतीचरण वर्मा

लव लव लव । ढेर सारा । 


तुम्हें कई दिनों से मिस करती!

 तुम्हारी 'बटुली'

श्रुति पाण्डेय 













Wednesday, May 14, 2025

मिज़ोरम में खेती

मिज़ोरम में खेती सिर्फ खाद्यान उगाने का तरीका नहीं, बल्कि यहां की जीवनशैली का अहम हिस्सा भी है। यहां की सबसे बड़ी फसल धान है, जिसे झूम और स्थायी खेती दोनों तरीकों से उगाया जाता है। मक्का भी यहां बहुत महत्वपूर्ण है, जो न केवल खाना, बल्कि पहाड़ी इलाकों में चारे के रूप में भी काम आती है। इसके अलावा, तिलहन जैसे सरसों और सोयाबीन की खेती भी होती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।

मिज़ोरम में दलहनों जैसे अरहर, मूँग और राजमा की भी खेती की जाती है। ये फसलें सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत के लिए भी फायदेमंद होती हैं। अदरक और हल्दी जैसी मसालेदार फसलों की भी यहां खेती की जाती हैं, और बात करें अगर मिज़ो मिर्च की तो वहअपनी चटख तीखेपन के लिए मशहूर है। बागवानी के क्षेत्र में, मिज़ोरम के संतरे और अनानास ने अच्छी पहचान बनाई है, खासकर चंपई ज़िले के चुआन्थर संतरे काफी  नामी है। बांस और केले के रेशे जैसी नकदी फसलें भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करती हैं।

जब बात होती है भारतीय कृषि के बारे में, तो अक्सर पंजाब, हरियाणा या उत्तर प्रदेश की तरह के बड़े, यांत्रिक खेती वाले राज्यों की चर्चा होती है। लेकिन मिज़ोरम में आज भी एक पुरानी जनजातीय और अनूठी खेती पद्धति मौजूद है—झूम खेती। यह खेती सिर्फ एक तरीका नहीं, बल्कि एक जीवनशैली, सांस्कृतिक धरोहर और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है।

क्या है झूम खेती?

झूम खेती, जिसे अंग्रेज़ी में शिफ्टिंग कल्टिवेशन या स्लैश एण्ड बर्न कल्टिवेशन कहा जाता है, एक पारंपरिक खेती प्रणाली है। इसमें किसान जंगल के पेड़-पौधों को काटकर जलाते हैं, और फिर राख का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में करते हैं। इसके बाद, किसान उस भूमि पर कुछ सालों तक फसलें उगाते हैं और फिर दूसरी जगह पर चले जाते हैं। यह तरीका भूमि और जंगल को खुद को फिर से पुनर्जीवित करने का मौका देता है।

झूम का सांस्कृतिक महत्व

झूम सिर्फ खेती नहीं है, यह मिज़ो जनजातियों की सामूहिकता, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान का प्रतीक है। यह मिज़ो संस्कृति का अहम हिस्सा है, जो 'Tlawmngaihna' (लावमंगैहना) की भावना पर आधारित है—जिसका मतलब है दूसरों की भलाई के लिए निःस्वार्थ सेवा। चापचरकुट जैसे कृषि उत्सव इस सांस्कृतिक धरोहर को और भी मजबूती से जीवित रखते हैं।

     (झूम खेती/ स्लैश एण्ड बर्न कल्टिवेशन) 


आंकड़ों की नज़र से

मिज़ोरम के कृषि विभाग की रिपोर्ट (2021-22) के अनुसार, लगभग 30,000 हेक्टेयर ज़मीन झूम खेती के तहत थी। हालांकि, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन की वजह से यह क्षेत्र धीरे-धीरे घट रहा है। अगर इसे सही तरीके से प्रबंधित किया जाए, तो झूम खेती एक स्थायी और पर्यावरण के अनुकूल कृषि मॉडल बन सकती है।

पर्यावरणीय दृष्टिकोण से झूम

आमतौर पर झूम को वन विनाश से जोड़ना एक सामान्य सी बात रही है, लेकिन आईसीएआर अनुसंधान परिसर (पूर्वोत्तर) की रिपोर्टों के अनुसार, जब इसे 10–15 वर्षों के पुनरावृत्ति चक्र में किया जाए, तो यह भूमि पुनर्योजन, जैव विविधता संरक्षण और मृदा उर्वरता के संतुलन में सहायक होती है।

सरकारी दृष्टिकोण

झूम खेती को समाप्त करने के बजाय अब सरकारें इसे सुधारने और टिकाऊ बनाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। नीति आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट ने झूम को केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आजीविका आधारित प्रणाली के रूप में देखा, जिसे वैज्ञानिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसके अनुरूप, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) और उत्तर-पूर्व परिषद (NEC) ने झूम प्रभावित इलाकों में बांस आधारित उद्योग, मधुमक्खी पालन और इको-पर्यटन जैसे वैकल्पिक आजीविका स्रोतों को प्रोत्साहन देना शुरू किया है। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) जैसे संस्थान झूम किसानों को जैविक खेती, मिश्रित फसल प्रणाली और जल संरक्षण तकनीकों में प्रशिक्षण देकर इस परंपरा को वैज्ञानिक रूप से मजबूत बना रहे हैं। ये प्रयास झूम को मिटाने के नहीं, बल्कि उसे आधुनिक सोच और तकनीक के साथ पुनर्जीवित करने की कोशिश हैं।

भविष्य की दिशा

झूम खेती का भविष्य उस मॉडल में है, जहां परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल हो। बांस आधारित कृषि, औषधीय पौधों की खेती, एग्रो-फॉरेस्ट्री और डिजिटल मार्केटिंग जैसी तकनीकों से इसे नया जीवन दिया जा सकता है। इससे न केवल मिज़ोरम की पारंपरिक खेती को बचाया जा सकता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भी एक स्थायी रास्ता तैयार किया जा सकता है।

झूम खेती को सिर्फ एक पिछड़ी  और अवैज्ञानिक खेती पद्धति समझना गलत होगा। यह मिज़ोरम की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक धरोहर का अहम हिस्सा है। इसे खत्म करने की बजाय समझने और संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि यह हमारे कृषि और पर्यावरणीय विमर्श को नया दृष्टिकोण दे सकें ।

Tuesday, May 13, 2025

पुराना पन्ना : १८ दिसम्बर


कभी-कभी कोई तारीख़ बस यूं ही दर्ज हो जाती है, जैसे किसी पन्ने पर नाम के बिना एक निशान। ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि वह दिन किसी घटना का हो, किसी टूटन या बनावट का हो। कई बार तारीख़ें हमारी स्मृति में सिर्फ इसलिए दर्ज हो जाती हैं क्योंकि हम उस दिन कुछ महसूस कर रहे थे शायद कुछ ऐसा जो पूरी तरह समझ नहीं आया।

तो अगर आज की बात हो भी रही हो, तो भी वह शायद सालों पुरानी बातों का ही शोर-सन्नाटा हो। क्योंकि ज़िंदगी कोई ‘आज’ नहीं होती, वह एक लगातार चलती हुई स्मृति-श्रृंखला है, जिसमें बीता हुआ कल और आने वाला कल एक ही धागे से बंधे होते हैं।

शांति से देखना और देखकर भी ना समझ पाना यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि बहुत गहरी चेतना की निशानी है। शायद इसलिए हमें बार-बार सिखाया गया कि शांति में ही अर्थ छुपे हैं। पर क्या यह सच में हमारी इच्छा है? या यह किसी सोची-समझी सामाजिक प्रणाली का हिस्सा है कि हम शांत रहें, बिना सवाल किए?

देखो, और फिर भी न स्पष्ट हो तो सुनो।पर सुनना हमेशा सुखद नहीं होता। क्योंकि सुनना केवल ध्वनि का प्रवेश नहीं है, यह आत्मा के भीतर उतरने वाली प्रक्रिया है। और अगर आप बिना छानबीन के सबकुछ सुनते हैं, तो वह केवल आपको सूचित नहीं करता वह आपको विषाक्त भी कर सकता है।

क्योंकि मसला यह नहीं कि आप सुन रहे हैं। मसला यह है कि आप क्या सुन रहे हैं, और किसे ?

यही वो बिंदु है जहां "चॉइस" एक भ्रम बन जाता है। हमारे पास विकल्प तो बहुत होते हैं, लेकिन उस कोहरे में जहां सबकुछ धुंधला हो, वहां चुनाव करना भी एक मानसिक युद्ध होता है। और कभी-कभी रेत पे नंगे पाँव चलना, किसी संघर्ष का हिस्सा नहीं बल्कि बस एक ‘जीने की कोशिश’ होती है। क्योंकि किसी को भी दर्द पसंद नहीं होता, पर कभी-कभी वही दर्द ज़िंदा होने का सबूत देता है।


(यह पेंटिंग एल ग्रीको ने 1608 और 1614 के बीच बनाया, "द विज़न ऑफ़ सेंट जॉन" या "द ओपनिंग ऑफ़ द फिफ्थ सील" के नाम से भी जाना जाता है।)


और तब, वही अनकहे दृश्य जिनसे हम हमेशा भागते रहे... हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। और जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि हमें वही दृश्य सबसे पहले देखने होते हैं, जिनसे हम सबसे ज़्यादा डरते हैं।ये सब मिलकर जन्म देते हैं उस आंतरिक संघर्ष को जो न तो पूरी तरह तार्किक होता है, न ही पूरी तरह निजी।  समाजशास्त्री 'मैक्स वेबर' ने इसी को 'आइरन केज' कहा था जब ज़िंदगी में हर चीज़ को सिर्फ तर्क और नियमों से देखा जाता है, तो इंसान की भावनाएं, सोच और आज़ादी धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। यह आधुनिक जीवन की सबसे चुप और घातक यातना है।

पर एक दिलचस्प बात यह है कि अगर यह पिंजरा पूरी तरह टूट जाए... अगर हमारी संवेदनाएं, इच्छाएं और विचार किसी सामाजिक मशीनरी के अधीन ना रहें तो दिमाग अनजाने भय से भर जाता है।क्योंकि स्थिरता, चाहे वह बंद कमरे में हो या खुली दुनिया में हमें एक झूठा भरोसा देती है कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में है।

कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानसिक ‘अनरेस्ट ’ को पूरी तरह दबाना आवश्यक नहीं, बल्कि उसे अवलोकन करना ज़्यादा प्रभावी होता है। यही वह स्थिति है जहाँ इंसान अपनी चेतना से गहराई में जुड़ता है।  एक ऐसी स्थिति जहाँ दुख भी सुकून में बदल सकता है।

इस संदर्भ में मनोविश्लेषक 'कार्ल जंग' की वह धारणा याद आती है, जिसमें वे कहते हैं, “One does not become enlightened by imagining figures of light, but by making the darkness conscious.” यानी, केवल रोशनी की कल्पना करने से आत्मज्ञान नहीं होता, बल्कि अपने भीतर के अंधेरे को देखने और समझने से होता है।

असल में, दिमाग की भी अपनी बायोलॉजी है; वह हर वक्त कुछ न कुछ सोचता है। उसकी भूख सिर्फ जानकारी की नहीं होती, बल्कि तर्क की, समाधान की और सबसे ज्यादा अस्तित्व के प्रमाण की होती है। और यहीं पर यह सवाल उठता है कि क्या प्रसन्नता ही वास्तविक सुख है ? 

प्रसन्नता अच्छी है, लेकिन ...अगर वह सतही हो तो वह बस एक क्षणिक गिलहरी की छलांग है, स्थायित्व नहीं।और दूसरी तरफ चिंता बुरी है, जैसा सब कहते हैं। लेकिन अगर उस चिंता में भी कोई गूढ़ सुकून है...एक धीमी पर सच्ची अनुभूति है, सीख है , मजबूती है तो क्या वह बुरी है?

तारीख़ें फिर से लौट आती हैं...कभी सवाल बनकर, कभी उत्तर की छाया में। और हम, एक लोहे के पिंजरे में कैद होते हुए भी, अपनी संवेदी क्षणों में थोड़ी देर के लिए आज़ाद होने की जुगत में लग जाते हैं।

शाम का समय

कल का दिन वैसे तो आम दिनों जैसा ही बोरिंग बीता, पर शाम पूरी तरह दिलचस्प थी। कभी-कभी वाकई ब्लेस्ड फील करती हूँ कि मैं लड़की हूँ, क्योंकि हरकत...