जंग राष्ट्र के लिए दीर्घकालिक पूंजी होती है : उषीनोर मजूमदार
गत द्विदिवसीय मिज़ोरम साहित्यिक महोत्सव में बतौर अतिथि 'उषीनोर मजूमदार' ने शिरकत किया। उषीनोर , एक प्रख्यात भारतीय खोजी पत्रकार हैं, जो भ्रष्टाचार और मानवाधिकार हनन जैसे मुद्दों पर काम करते हैं। उन्होंने द कारवां, द वायर,और हफपोस्ट इंडिया जैसे मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग की है। मजूमदार की खोजी पत्रकारिता का उद्देश्य महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उजागर करना है, विशेष रूप से वे कहानियां जो आमतौर पर नजरअंदाज की जाती हैं। प्रस्तुत है श्रुति पाण्डेय के साथ बातचीत के कुछ अंश ।
श्रुति पाण्डेय
आइज़ोल
सवाल : विज्ञान का एक नियम है जो यह कहता है कि किसी भी क्रिया में लागत ,मुनाफे से अधिक नहीं होनी चाहिए । आपने अधिकतर किताबें जंग आधारित लिखी है तो आपका क्या सोचना हैं इस संदर्भ में ?
जवाब : सत्ताधारियों का कोई नुकसान नहीं होता, उन्हें सिर्फ फायेदा होता है (हँसते हुए) , पर हाँ …फिर भी अगर बात मुनाफे की जाए तो मुनाफा है तात्कालिक नहीं दीर्घकालिक है । कोई भी जंग किसी भी राष्ट्र की शक्ति को दर्शाती है और कहीं ना कहीं एक दीर्घकालिक सैन्य स्थायित्व भी देती है इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि कीमत निश्चित ज्यादा है पर मुनाफा भी है।
सवाल : आपकी पहली किताब ‘गॉड ऑफ सिन’ थी। इसका विचार कैसे आया?
जवाब : यह किताब लिखने का आग्रह मेरे पास आया था क्योंकि इससे पहले मैं जांच पत्रकारिता में था तो ऐसे रिसर्च आधारित रिपोर्टिंग करता रहता था और इसका बैकग्राउंड भी मेरे पास था मैंने काफी रिसर्च वगैरा की हुई थी तो यह बहुत जरूरी था की किताब लिखी जाए और यह बहुत जरूरी मुद्दा था ताकि लोग इसे चेते और सजग हों।
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| मिज़ोरम साहित्यिक महोत्सव में बतौर अतिथि उषीनर मजूमदार के साथ श्रुति पाण्डेय। |
जवाब : देखिए, हम सभी अपने जीवन में अपने-अपने स्तर से संघर्ष कर रहे हैं। उन संघर्षों के मध्य हम कई बार अधीर हो जाते हैं। हमें ईश्वर या ईश्वर जैसा कोई चमत्कार करने वाला चाहिए होता है। अब ऐसे में कोई यह आकर दावा करने लगे कि वह सारी परेशानी खत्म कर देगा। बस ऐसा कर दो ,वैसा कर दो। जैसे मैं कह रहा हूं । तो हम उसे व्यक्ति के बहकावे में आ जाते हैं जो की बहुत ही सामान्य सी प्रक्रिया है । और यह बड़े राष्ट्रीय स्तर के बाबा है पर ऐसे ना जाने कितने छिटपुटिए बाबा है, जिन पर देश का आधे से अधिक हिस्सा निर्भर है। हम इनके फांसे में आ जाते है क्योंकि हम परेशान हैं, क्योंकि हम थक चुके हैं, क्योंकि हम और संघर्ष करना नहीं चाहते। तो हमें ऐसे किसी देवदूत की जरूरत पड़ती ही है । और कमाल की बात है कि यह लोग खुद को वैसे बेच भी रहे हैं। तो यह चीज जागरूकता से कम तो हो सकती है। पर खत्म तो कभी शायद ही हो। क्योंकि यह भारत है और यहां लोग चमत्कार की उम्मीद नहीं छोड़ेंगे । ऐसे में वह लोग ठगे जाएंगे ।
सवाल : आसाराम के पास भीड़ की शक्ति थी। उस पर किताब लिखने के बाद किन दिक्कतों का सामना आपको करना पड़ा?
जवाब : जब मैंने आसाराम पर अपनी किताब लिखी, तब मुझे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सबसे पहले, कानूनी दबाव काफी था। किताब के प्रकाशित होते ही उनके समर्थकों ने मुझ पर कानूनी कार्रवाई की धमकियां देना शुरू कर दीं। यह उनका एक तरीका है आलोचकों को चुप कराने का, ताकि कोई उनके खिलाफ बोल न सके। इसके अलावा, आसाराम के समर्थकों द्वारा मुझे व्यक्तिगत रूप से भी काफी परेशान किया गया। उन्होंने ऑनलाइन ट्रोलिंग की, धमकियां दीं और मुझे डराने की कोशिशें की। जब आप किसी ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति पर लिखते हैं जिसके लाखों समर्थक हों, तो ये चीजें सामान्य हो जाती हैं। वह सारे केस आज भी चल रहें हैं । एक और बड़ी चुनौती थी सुरक्षा । जिस तरह से आसाराम के समर्थक काम करते हैं और उनके प्रभाव को देखते हुए, मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई थी। मैं बहुत साधारण इंसान हूँ यह सब मेरे लिए नया था । । यह बहुत जोखिमभरा काम था, लेकिन सच्चाई को सामने लाने के लिए यह कदम जरूरी था।
सवाल : हमने सुना है कि आपकी किताब, फिल्म की शक्ल ले रही है?
जवाब: जी हां, फिल्म बन रही है, जिसका आधिकारिक नाम ‘न्याय –गॉड ऑफ सिन’ है। यह फिल्म एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद विषय पर आधारित है, जो आत्म-घोषित बाबा आसाराम की कहानी को चित्रित करती है।
सवाल : किताब पढ़ने वालों के लिए फिल्म देखना कितना अलग होगा?
जवाब: बहुत… क्योंकि इस फिल्म में हमने काफी भावनात्मकता के साथ अपनी बात रखी है। उन तीन महिलाओं के संघर्ष को दिखाया गया है, जिन्होंने इस व्यक्ति के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ी। फिल्म में मोहद ज़ीशान आयूब, फ़ातिमा सना शेख, और रघुबीर यादव जैसे प्रतिभाशाली कलाकार शामिल हैं। इसे नित्या मेहरा द्वारा निर्देशित किया जा रहा है, जो अपने अनूठे दृष्टिकोण के लिए जानी जाती हैं। यह पूरी घटना परदे पर जीवंत दिखेगी।
सवाल : चलें आपके आगामी फिल्म के लिए आपको शुभकामनाएं । आपने पत्रकारिता में काफी अच्छा काम किया है। पर पहले अंशकालिक लेखन शुरू किया अब पत्रकारिता को पूर्णकालिक विदा कह दिया है . ऐसा क्यों?
जवाब: धन्यवाद ! विदा नहीं किया, पर हाँ आप ने सही कहा। मैंने कुछ चीजे छोड़ी है। और कुछ चीजें ज्यादे तेज़ी से पकड़ी है । आपके पास दो ही हाथ है। कुछ चीजों को पकड़ने के लिए, कुछ तो छोड़ना पड़ता है।
सवाल : पर यह काफी ऊपर ऊपर का जवाब है। जो लोग पत्रकारिता सीख रहें है , उनके लिए आप कृपया मुझे जमीनी और ईमानदार जवाब दें?
जवाब: देखिए ! आप इसे ऐसे लें सकती है कि आप न्यूज रूम में दुनिया बदलने आते हैं, क्रांति करने आते हैं । शुरू- शुरू में आप करते भी हैं। फिर आप रोके -टोके जाते हैं। फिर आपको थोड़ी समझाईश भी दी जाती है। तब भी आप नहीं सुधारते तो तब समीक्षा, आलोचना का रूप ले लेती है। मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ । पर हाँ, ऐसा है कि पत्रकारिता करते समय ही मेरा अंशकालिक लेखन चल रहा था , जहाँ मैंने विभिन्न मुद्दों पर लेख लिखने का अनुभव लिया। इस समय मैंने समझा कि पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सटीकता और तात्कालिकता है। हालांकि, इस चीज ने मुझे अक्सर अपने विचारों को संक्षेप में कहने पर मजबूर किया, जिससे मैं अपने लेखन के गहरे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा था। जैसे-जैसे मैंने अपनी रचनात्मकता और विचारों को विकसित किया, मैंने यह महसूस किया कि मेरे लिए महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से लिखना और गहराई में जाकर विचार करना कितना जरूरी है। इसके जरिए मैं यह सोचने पर मजबूर हुआ कि क्या मैं वास्तव में पत्रकारिता के अनुकूल हूँ। मैंने देखा कि मैं ऐसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता था जो लंबे समय में समाज पर प्रभाव डालते हैं, जैसे सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, और समकालीन राजनीति। इसलिए, मैंने निर्णय लिया कि मैं पूर्णकालिक (आपकी भाषा में) पत्रकारिता को विदा कर दूँ। ताकि मैं स्वतंत्र रूप से अपनी रचनात्मकता का उपयोग कर सकूँ। देखिए! मैं मानता हूं कि किसी भी राष्ट्र की धार तलवार और कलम दोनों से तय हो तो बेहतर है।
सवाल : आखिरी सवाल, जो युवा जांच पत्रकारिता या पत्रकारिता में अपना भविष्य देखते हैं, उनको आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
जवाब: मेरा मानना है कि अगर किसी को इस सवाल से सरोकार है तो यह सवाल दस और लोगों से भी पूछें। सिर्फ मेरे जवाब को ब्रम्हवाक्य ना मान लें। रही बात जांच पत्रकारिता की तो किसी भी कार्य की गहनता में ईश्वर होता है । आप अगर इस क्षेत्र में आ रहे हैं तो जो चीज़ें चल रही हैं उनके पीछे जाए । जो चीज़ें जितनी बताई जा रही है जितनी दिखाई दे रही है या जितनी सुनाई दे रहीं है। सिर्फ उतना ना जाने , देखें और सुने । उसके पीछे के चीजों को खंगाले । पढ़े । जितना ज़्यादा हो सके। और सीखते रहें जानते रहे। इतना तो आधार है। इतना तैयार रखें।

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