Tuesday, September 2, 2025

प्रेम पत्र

डिअर प्रिया, 

झप्पी विद पप्पी ...

तुम सोच रही होगी फिर आ गया इसका... लो पकाएगी, मैंने कोशिश पूरी की है देखो! क्या और कौन पकता है । फिलहाल मेरे पास अर्थ की कमी है तो आप इन शब्दों के अर्थो से ही काम दुरुस्त करें । 

कैसी हो ? यह शुरुआती कुछ ऐसी पंक्तियाँ हैं जो हर चिट्ठी में होना आम है । पर इसका जवाब पता रहते हुए भी हर चिट्ठी में इसे लिखा जाना शायद  यह आम ना हो। मैं तुम्हारे हर जन्मदिन पर अपना अंकन चाहती थी चाहे वो ज़िद ही क्यूँ ना हो । पर ये क्या ? इस वर्ष मैंने देखा कि मैं कुछ तुम्हारी तरह बनती जा रही हूँ। थोड़ी नीरस थोड़ी अर्थसंगत । अब देखो न तुम्हारे खास दिन पर मैंने कुछ नहीं दिया। इसलिए यह चिठ्ठी लिख रही हूँ । 

पर मैं अपने इस हरकत को खारिज़ करना चाहूँगी और और कहना चाहूँगी कि कोई काम इसीलिए मत करो की वह तुम्हारे गिल्ट को कम करे या उसे मसले को संतुलित करे। संतुलन आवश्यक है पर वह मुक्त सोच से जन्म हो ना की किसी का मन रखने के लिए । इसीलिए यह लेटर आज लिख रही हूँ मुक्त होकर गिल्ट फ्री हो कर  पाँच जून को। उम्मीद करती हूँ कि तुम मुझे हमेशा की तरह समझोगी ।  

 मैंने देखा फ़ोटोज़ और वीडियोज़ तुम्हारे जन्मदिन के, तुम्हारे दोस्तों के साथ... अच्छा लगा, तुम खुश लगी, मजा आया देख कर ।पर साथ ही ऐसा लगा शायद अब मेरी प्रासंगिकता उतनी रही नहीं । तुम्हारा बातों में आकांक्षा या साज़िदा का बखान... उनके फोन आने पर मेरा कॉल कट कर देना ...मुझे अहसास कराता है कि आईआईएमसी वाले  सही कह रहे थे कि कब तक चिपकी रहोगी?

 पर यकीन मानो मसला असुरक्षा का कत्तई नहीं है तुम तो जानती हो... असुरक्षा जैसी चीज मेरी इर्द गिर्द नहीं होती।  पर मसला है टाइम का, बेफिजूल की बातों का, जो आजकल हो नहीं पा रही । शायद  मेरा ऐसा सोचना यह किसी भी रिश्ते का रेड फ्लैग हो सकता है तो क्या हुआ कि मैं तुम्हारी बहन हूँ । कोई कितना भी करीबी हो रेड फ्लैग पहचानना आना चाहिए। खैर ( ख पे नुक्ता लगा के पढ़ना) बस ऐसे ही कह दिया ।

तुमको शायद पता हो तुम मेरे लिए घर के माफिक हो । कहीं से भी चलूँ लौट के तुम पर ही आना तय है। तुम बिंदास, बेलौस, बेपरवाह टाइप्स हो और ऐसे ही बने रहना । कभी भी खुद को किसी भी मसले में विक्टिम के भांति मत देखना । खुद के स्टोरी में तो हम खुद हीरो हो ही सकते हैं । हम किसी जगह किसलिए जुड़े यह देखना होगा वहाँ से हमें जो चाहिए तो वो मिला या नहीं हमें बस इतना ही देखना होता है और आगे बढ़ना होता है आगे जाने  का रास्ता शायद और दिलचस्प हो... इसलिए मन हो ना हो, भावनाएं साथ दें ना दें, आगे बढ़ना होता है और खुश होकर बढ़ना होता है।

तुम कई लोगों से मिलोगी तुम्हें बताया जाएगा या मालूम होगा कि इट्स ओके टू एक्स्प्रेस ...  फलाना -ढमाका... इन बातों को ज्यादे गंभीरता से नहीं लेना है । भावनाओं को भी ज्यादे गंभीरता से नहीं लेना है इनको कोई क्या ही ले ये खुद बदलती रहती हैं । तो बेहतर है वो करो जो दिमाग कह रहा है और उसमे थोड़ा बहुत मन भी साथ दे रहा है । शाहरुख खान कहते हैं : करना वही होता है जो करना चाहिए । 

यार मैंने हाल ही में अभिनेता पंकज त्रिपाठी की पॉडकास्ट सुनी उसमें वो कह रहे थे कि उन्होंने अपने लाइफ में ऐसा देखा है कि हम जिन चीजों की प्रैक्टिस करते हैं वह चीजें धीरे धीरे हमारी लाइफ में आने लगती हैं । तो हमें मुस्कुराने और खुश रहने की प्रैक्टिस करनी चाहिए । ये बातें कहने में थोड़ी हार्ड लग रही है पर उन्होंने ऐसा ही कहा । पर यकीन मानो यार हमारे लाइफ में वास्तव में चीजें काफी बेहतर है । और मन से मुस्कुराने लायक है अब जब मैंने दिल्ली में नज़र घूमाती हूँ तो यहाँ दिखता है फूटपाथ जो अमूमन छोटे शहरों में नहीं होता पर... कुछ चीजे कॉमन होती है।  तुम समझ गई होगी । 

मैं आईआईएमसी में थी तब वहाँ मुझसे एक बात कही थी किसी ने, आप लोग पत्रकारिता नहीं शौक पूरे करने आए  है क्योंकि पत्रकारिता का जन्म असंतोष और जद्दोजहद में होता है । आज भी यह संवाद बड़ी ही निष्ठुरता  के साथ मेरे जेहन में जगह बनाए हुए है और इसे मैं शायद रखना चाहूँगी । मैं यही कहना चाहती हूँ कि किसी को भी असंतोष और जद्दोजहद की जरूरत किसी भी जगह बेहतर करने के लिए पड़ती ही हैं। तुम अपने काम में इसे सबसे पहले रखना कभी भी तुम्हारा  काम तुम्हें बहुत अच्छा या अंतिम सत्य सा नहीं लगना चाहिए । लोगों से ज्यादे कमी तुम अपने काम में देखो और उसे पारिष्कृत करने  में लगे रहो शायद हम इससे थोड़ा बेहतर हो सके । 

मेरे कमजोर समय में तुम हमेशा मेरे साथ रही हो । यह बात में कई बार शायद तुम्हें बता चुकी हूँ। कहा से आते है ऐसे लोग जो आपके मापदंड को बढ़ा जाए।और फिर कोई भी मिले तो आप सामने से मना ही कर दो।नहीं चाहिए। 

यार मुझे लगता हैं सिनेमा ने हमारा अलग दिमाग खराब कर रखा हैं । फिल्म लंचबॉक्स का संवाद याद है ? " कभी - कभी गलत ट्रेन भी सही जगह पहुंचा देती है। " तो मैं यही कहना चाहती हूँ कि ऐसा नहीं होता है गुरु । गलत ट्रेन अधिकतर गलत स्टेशन पर ही पहुंचाती है जितना जल्दी हो सके उतर जाना चाहिए ज्यादा किराया देने से आप बच जाते है। जो ट्रेन आपको सही जगह पहुंचा रही है वो गलत ट्रेन है ही नहीं, पहले तो ये एक्सेप्ट कीजिए । और अगर मान  लो ऐसा हुआ भी तो ये उनलोगों के साथ हो सकता है जिनको अपने स्टेशन का पता ही ना हो । 

त्रासदी है तुम्हारे साथ मेरी कोई नई यादें नहीं जिन्हे बखूबी लिखा जाए । मैं तुमसे एक बात जो कभी नहीं कही पर तुम्हे हमेशा से जानती रही कि  मैं तुम्हारी बहुत इज़्ज़त करती हूँ और सबसे ज़्यादा सराहती भी हूँ। पर इसका मलतब यह कत्तई  नहीं कि मैं तुम्हें आप और दीदी जैसे शब्दों से प्रताड़ित करने लगूँ । ऐसा नहीं होगा । और आखिरी सबसे महत्व पूर्ण बात कि सबसे पहले खुद को पसंद करो, सबसे पहले खुद की इज्जत करो, खुद को सराहो, खुद को अपनाओ,खुद को प्यार करो। फिर मुझे । शायद यह मुझे यह चीज अपने में भी लानी चाहिए। ये सब गप्पा गोल है मेरे में तो । सबसे इम्पॉर्टन्ट बात कि किसी को ज्ञान नहीं देना चाहिए। लेकिन तुम मुझे देना । मेरे को तो जरूरत है । 

लव यू Moti (दुनिया कुछ भी कहे इसे तुम मोती पढ़ना : चमकदार, अमूल्य, और अनमोल)।


हम भला-बुरा सब भूल चुके, नतमस्तक हो मुख मोड़ चले
अभिशाप उठाकर होठों पर, वरदान दृगों से छोड़ चले ।

अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बन्धे थे और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले। 

हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले ।
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले। 

भगवतीचरण वर्मा

लव लव लव । ढेर सारा । 


तुम्हें कई दिनों से मिस करती!

 तुम्हारी 'बटुली'

श्रुति पाण्डेय 













शाम का समय

कल का दिन वैसे तो आम दिनों जैसा ही बोरिंग बीता, पर शाम पूरी तरह दिलचस्प थी। कभी-कभी वाकई ब्लेस्ड फील करती हूँ कि मैं लड़की हूँ, क्योंकि हरकत...