Friday, February 7, 2025

पूर्वोत्तर की जनवरी :२०२५

2024 बीत रहा था , और बीतने के साथ 2025 चढ़ रहा था । सोच रही थी कि इस साल की शुरुआत में क्या मज़ेदार किया जाए ? साल का पहला छह महीने बीत चुके थे। यह छ: महीने बहुत गंभीरता से बीते । थोड़ा डरते, सकुचाते , लोगों को देखते-सुनते और ढेर सारी तस्सलियों के साथ आगे बढ़ते । जिसे कभी मन देता तो कभी दोस्त। पर तस्सलियाँ और नई उम्मीदें मिलती रहीं… जिससे सफर आसान होता चला गया । सफर का आसान होना और दिलचस्प होना दो अलग-अलग बातें हैं। यह पहला छह महीने दोस्तों की वजह से आसान रहा तथा कथित दोस्तों की वजह से दिलचस्प भरा भी रहा।
बीतते साल के साथ बहुत सी अच्छी बातें शुरू हुईं, जैसे कि मेरी इंटर्नशिप ईश्वर की अनुकंपा और बड़ों के आशीर्वाद से डीआईपीआर (Directorate of Information & Public Relations, Mizoram) में लग गई । यह मेरे लिए राहत की बात थी । इस दौरान हमारी क्षेत्रीय महानिदेशक प्रो शाश्वती गोस्वामी तथा पूर्व क्षेत्रीय महानिदेशक सर साइलो का बड़ा सहयोग रहा । सहयोग की बात करूँ तो एक नाम प्रमुखता से ऊपर आएगी वह हैं- डॉ अनुज , इनके बारे में कुछ कहना-सुनना बेईमानी होगी । बस इतना समझे की पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और दुर्गम रास्तों पर भी अगर घर्षण कम है तो इसका कारण यह सज्जन रहें हैं । इनके साथ-साथ सहयोग रहा आईआईएमसी और मिज़ोरम विश्वविद्यालय के अन्य दोस्तों का भी।
उत्तर भारत की भीड़भाड़ और भागदौड़ से हटकर, यह शहर किसी प्रेमी जोड़े की भांति अलग दिखा , शांत और स्वयं में । मेरी एक महीने की इंटर्नशिप थी, लेकिन अनुभव सिर्फ़ दफ़्तर तक सीमित नहीं रहा…यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक, पत्रकारिता और फ़ोटोग्राफ़ी का सफ़र बन गया। जनवरी की ठंडी सुबह जब आइज़ॉल सिटी की ओर कदम बढ़ाया, तो मन में उत्सुकता और रोमांच दोनों थे । पर साथ था तो थोड़ा डर भी। डर नए रास्तों का , नए लोगों का , नए खान-पान तौर-तरीकों का ।
यहाँ अगर मुद्रा और भावनाएं छोड़ दें तो कुछ भी उत्तर जैसा नहीं है । यहाँ यूरोप की संस्कृति मानी जाती है और फैशन में तो यहाँ के पॉप और ड्रामा का प्रभाव दिखाता है । यहाँ स्किन केयर, मेकअप और ड्रेसिंग सेंस में तो कोई मुकाबला नहीं। कई बार हम कैजुअल कपड़ों में भी बाहर निकल जाते थे । पर बाहर जाकर जो आत्मग्लानि के शिकार होते थे, उनका कोई हिसाब नहीं है। देखें! कपड़े और मेकअप की बातें मुझसे ना जानने की कोशिश करें। यह अक्सर मुझे विषयांतर कर देती है।
हाँ तो डीआईपीआर में काम करने का माहौल सीखने और आगे बढ़ने का था। प्रेस रिलीज़ तैयार करना, सोशल मीडिया कंटेंट बनाना तथा डीआईपीआर द्वारा उसे पोस्ट करना, मेरे अनुभव को खास बनाता है । यहाँ प्रशिक्षण के दौरान मैं विभिन्न मंत्रालयों के साथ होने वाली बैठक का हिस्सा बन पाई । यह जान पाई की कौन -कौन सी नीतियाँ अभी आने वाली हैं , कौन सी नीतियों में सरकारी तंत्र असफल हो रहे हैं इत्यादि । तमाम कार्यक्रमों की आधिकारिक फोटोग्राफी और कवरेज करना एक अनूठा अनुभव रहा। संस्था ने नए इंटर्न को मुख्यमंत्री लालदूहोमा के साथ होने वाली बैठक का हिस्सा बनाया गया । इस बैठक की खास बात यह थी की मीटिंग मिज़ो भाषा में थी पर मेरे मार्गदर्शक के रूप में मुख्यमंत्री के पर्सनल सेक्रेटरी तथा पब्लिक इनफार्मेशन ऑफिसर थे । जिन्होंने मीटिंग के पहले दो कप चाय पिलाई और विस्तार से काम समझाया । यह बताया कि यह मीटिंग किस विषय पर है और क्यों जरूरी है ? मुझे कुछ नोट्स और बुकलेट्स दिए जिसके आधार पर मैंने मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया हैन्डल के लिए पोस्ट दिए।

वहीं दूसरी ओर विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के लिए बतौर अनुवादक काम करने का मौका मिला । मेरे मार्गदर्शक पीआरओ सर के द्वारा मिज़ोरम राजभवन की कार्य पद्धति से अवगत कराना तथा नव नियुक्त राज्यपाल डॉ वी के सिंह के शपथ ग्रहण समारोह में साक्षी बनने का अवसर देना वो भी एक प्रशिक्षु को, काफी बड़ी बात रही । हालांकि मुझे आईआईएमसी में चल रहे वर्कशॉप के कारण यह अवसर छोड़ना पड़ा । खैर फिर सवेरा हुआ । आज की किरणें फिर राजभवन का रास्ता दिखा रही थीं। दिनांक था—३० जनवरी (यूपी स्थापना दिवस)।इंटर्नशिप के एक महीने पूरे होने वाले थे। जहां मेरा दफ्तर था, वहाँ से राजभवन साफ दिखाई देता था। आज मुझे वहाँ राज्यपाल के समक्ष मंच संचालन करने का अवसर मिला । जहां मेरी मुलाकात स्क्वाड्रन लीडर मनीषा पाधी (आईएएफ-2015 बैच) से हुई । स्क्वाड्रन लीडर मनीषा भारत की पहली महिला आईएएस इंडियन आर्म्ड फोर्सेज ऑफिसर रहीं । अभी वह राज्यपाल के बतौर अपर एडिसनियुक्त हैं तथा उनसे मिलना प्रेरणास्रोत रहा । जब मैंने उनसे स्पष्ट किया, जैसे स्क्वाड्रन लीडर वीर प्रताप सिंह वैसे ही? उन्होंने सिनेमा का संदर्भ पकड़ते हल्की मुस्कान के साथ कहा -जी वैसे ही । कार्यक्रम समापन पर था और अंततः मिजोरम के राज्यपाल से मिलना हुआ। जिसमें उन्होंने प्रोत्साहन भरे शब्द कहे ,हाल-चाल लिया। उन्होंने अपने अनुभव साझा किए और मेरे अनुभवों को यादगार बनाया।

डीआईपीआर के काम के साथ-साथ, आइज़ॉल की गलियाँ मुझे फ़ोटोग्राफ़ी के लिए आकर्षित करने लगीं थीं। यहाँ की हर गली, हर नुक्कड़ अपनी कहानी कहता है। बड़ा बाज़ार में पारंपरिक मिज़ो परिधान पहने लोग, बांस और लकड़ी से बनी अनूठी चीज़ें, और चारों तरफ पहाड़ी संस्कृति की झलक यह सब कैमरे में क़ैद करना अपने आप में एक शानदार अनुभव था। यहाँ के बाज़ारों में लोग अनुशासित ढंग से खरीदारी करते हैं, कोई धक्का-मुक्की नहीं, सब अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। इसी दौरान मैंने मिज़ो समाज की महिलाओं को भी काफ़ी सक्रिय रूप में देखा… चाहे वह बाज़ार हो या सरकारी दफ़्तर, हर जगह महिलाओं की बराबर से अधिक भागीदारी थी।
इस बीच खान-पान तथा स्वास्थ्य काफी प्रभावित हुए। खाने की दिक्कत यहाँ सिर्फ शाकाहार में है । बाकी लोगों के लिए विकल्प बहुत हैं, बस आप मुँह खोलिए। शहर में परिवहन का अनुभव भी दिलचस्प था। पहली बार बस का अनुभव करते हुए यह एहसास हुआ कि यह सिस्टम कितना व्यवस्थित और सुविधाजनक है। लोग कतार में खड़े होते हैं, कोई जल्दबाज़ी नहीं करता । यात्रा करते हुए शहर के लोगों की सादगी और अनुशासन को क़रीब से देखने का मौका मिला। पर यहाँ शाम छ: बजे के बाद बसें नहीं चलतीं, लेकिन तब बाइक टैक्सी , साझा टैक्सियाँ यातायात का प्रमुख साधन होती हैं। हालांकि यहाँ यातायात जितना मुश्किल है, लिफ्ट मिलना उतना ही आसान है। यहाँ आप (खासकर लड़कियां) बिना डरे किसी से भी लिफ्ट ले सकती हैं । यहाँ लोग आसानी से लिफ्ट दे देते हैं । यहाँ लिफ्ट लेना शौक नहीं, मजबूरी है । आप इससे बच नहीं सकते ।
डीआईपीआर की इस इंटर्नशिप ने न सिर्फ़ मेरी प्रोफेशनल स्किल्स को निखारा, बल्कि मुझे एक नई दुनिया से भी मिलवाया। आइज़ॉल की गलियों में घूमना, वहाँ की संस्कृति को समझना, नॉर्थ ईस्ट के जायके चखना और वहाँ के लोगों की सादगी को महसूस करना यह सारी चीजें मेरे आत्म विश्वास में इज़ाफ़ा करने में मददगार रहीं ।
तो अगर आप स्वकेंद्रित व्यक्तित्व के धनी हैं। आप नहीं करते किसी की मदद और ना ही लेते किसी से ...तो आपको थोड़े ही समय के लिए ही सही पर पूर्वोत्तर आना चाहिए । यह प्रदेश विनम्रता से भरा है , हाँ, दिक्कतें हैं, वो हर जगह ही होती हैं, पर विनम्रता हर जगह नहीं होती ।

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