Wednesday, May 14, 2025

मिज़ोरम में खेती

मिज़ोरम में खेती सिर्फ खाद्यान उगाने का तरीका नहीं, बल्कि यहां की जीवनशैली का अहम हिस्सा भी है। यहां की सबसे बड़ी फसल धान है, जिसे झूम और स्थायी खेती दोनों तरीकों से उगाया जाता है। मक्का भी यहां बहुत महत्वपूर्ण है, जो न केवल खाना, बल्कि पहाड़ी इलाकों में चारे के रूप में भी काम आती है। इसके अलावा, तिलहन जैसे सरसों और सोयाबीन की खेती भी होती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।

मिज़ोरम में दलहनों जैसे अरहर, मूँग और राजमा की भी खेती की जाती है। ये फसलें सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत के लिए भी फायदेमंद होती हैं। अदरक और हल्दी जैसी मसालेदार फसलों की भी यहां खेती की जाती हैं, और बात करें अगर मिज़ो मिर्च की तो वहअपनी चटख तीखेपन के लिए मशहूर है। बागवानी के क्षेत्र में, मिज़ोरम के संतरे और अनानास ने अच्छी पहचान बनाई है, खासकर चंपई ज़िले के चुआन्थर संतरे काफी  नामी है। बांस और केले के रेशे जैसी नकदी फसलें भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करती हैं।

जब बात होती है भारतीय कृषि के बारे में, तो अक्सर पंजाब, हरियाणा या उत्तर प्रदेश की तरह के बड़े, यांत्रिक खेती वाले राज्यों की चर्चा होती है। लेकिन मिज़ोरम में आज भी एक पुरानी जनजातीय और अनूठी खेती पद्धति मौजूद है—झूम खेती। यह खेती सिर्फ एक तरीका नहीं, बल्कि एक जीवनशैली, सांस्कृतिक धरोहर और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है।

क्या है झूम खेती?

झूम खेती, जिसे अंग्रेज़ी में शिफ्टिंग कल्टिवेशन या स्लैश एण्ड बर्न कल्टिवेशन कहा जाता है, एक पारंपरिक खेती प्रणाली है। इसमें किसान जंगल के पेड़-पौधों को काटकर जलाते हैं, और फिर राख का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में करते हैं। इसके बाद, किसान उस भूमि पर कुछ सालों तक फसलें उगाते हैं और फिर दूसरी जगह पर चले जाते हैं। यह तरीका भूमि और जंगल को खुद को फिर से पुनर्जीवित करने का मौका देता है।

झूम का सांस्कृतिक महत्व

झूम सिर्फ खेती नहीं है, यह मिज़ो जनजातियों की सामूहिकता, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान का प्रतीक है। यह मिज़ो संस्कृति का अहम हिस्सा है, जो 'Tlawmngaihna' (लावमंगैहना) की भावना पर आधारित है—जिसका मतलब है दूसरों की भलाई के लिए निःस्वार्थ सेवा। चापचरकुट जैसे कृषि उत्सव इस सांस्कृतिक धरोहर को और भी मजबूती से जीवित रखते हैं।

     (झूम खेती/ स्लैश एण्ड बर्न कल्टिवेशन) 


आंकड़ों की नज़र से

मिज़ोरम के कृषि विभाग की रिपोर्ट (2021-22) के अनुसार, लगभग 30,000 हेक्टेयर ज़मीन झूम खेती के तहत थी। हालांकि, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन की वजह से यह क्षेत्र धीरे-धीरे घट रहा है। अगर इसे सही तरीके से प्रबंधित किया जाए, तो झूम खेती एक स्थायी और पर्यावरण के अनुकूल कृषि मॉडल बन सकती है।

पर्यावरणीय दृष्टिकोण से झूम

आमतौर पर झूम को वन विनाश से जोड़ना एक सामान्य सी बात रही है, लेकिन आईसीएआर अनुसंधान परिसर (पूर्वोत्तर) की रिपोर्टों के अनुसार, जब इसे 10–15 वर्षों के पुनरावृत्ति चक्र में किया जाए, तो यह भूमि पुनर्योजन, जैव विविधता संरक्षण और मृदा उर्वरता के संतुलन में सहायक होती है।

सरकारी दृष्टिकोण

झूम खेती को समाप्त करने के बजाय अब सरकारें इसे सुधारने और टिकाऊ बनाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। नीति आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट ने झूम को केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आजीविका आधारित प्रणाली के रूप में देखा, जिसे वैज्ञानिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसके अनुरूप, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) और उत्तर-पूर्व परिषद (NEC) ने झूम प्रभावित इलाकों में बांस आधारित उद्योग, मधुमक्खी पालन और इको-पर्यटन जैसे वैकल्पिक आजीविका स्रोतों को प्रोत्साहन देना शुरू किया है। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) जैसे संस्थान झूम किसानों को जैविक खेती, मिश्रित फसल प्रणाली और जल संरक्षण तकनीकों में प्रशिक्षण देकर इस परंपरा को वैज्ञानिक रूप से मजबूत बना रहे हैं। ये प्रयास झूम को मिटाने के नहीं, बल्कि उसे आधुनिक सोच और तकनीक के साथ पुनर्जीवित करने की कोशिश हैं।

भविष्य की दिशा

झूम खेती का भविष्य उस मॉडल में है, जहां परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल हो। बांस आधारित कृषि, औषधीय पौधों की खेती, एग्रो-फॉरेस्ट्री और डिजिटल मार्केटिंग जैसी तकनीकों से इसे नया जीवन दिया जा सकता है। इससे न केवल मिज़ोरम की पारंपरिक खेती को बचाया जा सकता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भी एक स्थायी रास्ता तैयार किया जा सकता है।

झूम खेती को सिर्फ एक पिछड़ी  और अवैज्ञानिक खेती पद्धति समझना गलत होगा। यह मिज़ोरम की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक धरोहर का अहम हिस्सा है। इसे खत्म करने की बजाय समझने और संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि यह हमारे कृषि और पर्यावरणीय विमर्श को नया दृष्टिकोण दे सकें ।

Tuesday, May 13, 2025

पुराना पन्ना : १८ दिसम्बर


कभी-कभी कोई तारीख़ बस यूं ही दर्ज हो जाती है, जैसे किसी पन्ने पर नाम के बिना एक निशान। ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि वह दिन किसी घटना का हो, किसी टूटन या बनावट का हो। कई बार तारीख़ें हमारी स्मृति में सिर्फ इसलिए दर्ज हो जाती हैं क्योंकि हम उस दिन कुछ महसूस कर रहे थे शायद कुछ ऐसा जो पूरी तरह समझ नहीं आया।

तो अगर आज की बात हो भी रही हो, तो भी वह शायद सालों पुरानी बातों का ही शोर-सन्नाटा हो। क्योंकि ज़िंदगी कोई ‘आज’ नहीं होती, वह एक लगातार चलती हुई स्मृति-श्रृंखला है, जिसमें बीता हुआ कल और आने वाला कल एक ही धागे से बंधे होते हैं।

शांति से देखना और देखकर भी ना समझ पाना यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि बहुत गहरी चेतना की निशानी है। शायद इसलिए हमें बार-बार सिखाया गया कि शांति में ही अर्थ छुपे हैं। पर क्या यह सच में हमारी इच्छा है? या यह किसी सोची-समझी सामाजिक प्रणाली का हिस्सा है कि हम शांत रहें, बिना सवाल किए?

देखो, और फिर भी न स्पष्ट हो तो सुनो।पर सुनना हमेशा सुखद नहीं होता। क्योंकि सुनना केवल ध्वनि का प्रवेश नहीं है, यह आत्मा के भीतर उतरने वाली प्रक्रिया है। और अगर आप बिना छानबीन के सबकुछ सुनते हैं, तो वह केवल आपको सूचित नहीं करता वह आपको विषाक्त भी कर सकता है।

क्योंकि मसला यह नहीं कि आप सुन रहे हैं। मसला यह है कि आप क्या सुन रहे हैं, और किसे ?

यही वो बिंदु है जहां "चॉइस" एक भ्रम बन जाता है। हमारे पास विकल्प तो बहुत होते हैं, लेकिन उस कोहरे में जहां सबकुछ धुंधला हो, वहां चुनाव करना भी एक मानसिक युद्ध होता है। और कभी-कभी रेत पे नंगे पाँव चलना, किसी संघर्ष का हिस्सा नहीं बल्कि बस एक ‘जीने की कोशिश’ होती है। क्योंकि किसी को भी दर्द पसंद नहीं होता, पर कभी-कभी वही दर्द ज़िंदा होने का सबूत देता है।


(यह पेंटिंग एल ग्रीको ने 1608 और 1614 के बीच बनाया, "द विज़न ऑफ़ सेंट जॉन" या "द ओपनिंग ऑफ़ द फिफ्थ सील" के नाम से भी जाना जाता है।)


और तब, वही अनकहे दृश्य जिनसे हम हमेशा भागते रहे... हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। और जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि हमें वही दृश्य सबसे पहले देखने होते हैं, जिनसे हम सबसे ज़्यादा डरते हैं।ये सब मिलकर जन्म देते हैं उस आंतरिक संघर्ष को जो न तो पूरी तरह तार्किक होता है, न ही पूरी तरह निजी।  समाजशास्त्री 'मैक्स वेबर' ने इसी को 'आइरन केज' कहा था जब ज़िंदगी में हर चीज़ को सिर्फ तर्क और नियमों से देखा जाता है, तो इंसान की भावनाएं, सोच और आज़ादी धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। यह आधुनिक जीवन की सबसे चुप और घातक यातना है।

पर एक दिलचस्प बात यह है कि अगर यह पिंजरा पूरी तरह टूट जाए... अगर हमारी संवेदनाएं, इच्छाएं और विचार किसी सामाजिक मशीनरी के अधीन ना रहें तो दिमाग अनजाने भय से भर जाता है।क्योंकि स्थिरता, चाहे वह बंद कमरे में हो या खुली दुनिया में हमें एक झूठा भरोसा देती है कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में है।

कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानसिक ‘अनरेस्ट ’ को पूरी तरह दबाना आवश्यक नहीं, बल्कि उसे अवलोकन करना ज़्यादा प्रभावी होता है। यही वह स्थिति है जहाँ इंसान अपनी चेतना से गहराई में जुड़ता है।  एक ऐसी स्थिति जहाँ दुख भी सुकून में बदल सकता है।

इस संदर्भ में मनोविश्लेषक 'कार्ल जंग' की वह धारणा याद आती है, जिसमें वे कहते हैं, “One does not become enlightened by imagining figures of light, but by making the darkness conscious.” यानी, केवल रोशनी की कल्पना करने से आत्मज्ञान नहीं होता, बल्कि अपने भीतर के अंधेरे को देखने और समझने से होता है।

असल में, दिमाग की भी अपनी बायोलॉजी है; वह हर वक्त कुछ न कुछ सोचता है। उसकी भूख सिर्फ जानकारी की नहीं होती, बल्कि तर्क की, समाधान की और सबसे ज्यादा अस्तित्व के प्रमाण की होती है। और यहीं पर यह सवाल उठता है कि क्या प्रसन्नता ही वास्तविक सुख है ? 

प्रसन्नता अच्छी है, लेकिन ...अगर वह सतही हो तो वह बस एक क्षणिक गिलहरी की छलांग है, स्थायित्व नहीं।और दूसरी तरफ चिंता बुरी है, जैसा सब कहते हैं। लेकिन अगर उस चिंता में भी कोई गूढ़ सुकून है...एक धीमी पर सच्ची अनुभूति है, सीख है , मजबूती है तो क्या वह बुरी है?

तारीख़ें फिर से लौट आती हैं...कभी सवाल बनकर, कभी उत्तर की छाया में। और हम, एक लोहे के पिंजरे में कैद होते हुए भी, अपनी संवेदी क्षणों में थोड़ी देर के लिए आज़ाद होने की जुगत में लग जाते हैं।

शाम का समय

कल का दिन वैसे तो आम दिनों जैसा ही बोरिंग बीता, पर शाम पूरी तरह दिलचस्प थी। कभी-कभी वाकई ब्लेस्ड फील करती हूँ कि मैं लड़की हूँ, क्योंकि हरकत...