मिज़ोरम में खेती सिर्फ खाद्यान उगाने का तरीका नहीं, बल्कि यहां की जीवनशैली का अहम हिस्सा भी है। यहां की सबसे बड़ी फसल धान है, जिसे झूम और स्थायी खेती दोनों तरीकों से उगाया जाता है। मक्का भी यहां बहुत महत्वपूर्ण है, जो न केवल खाना, बल्कि पहाड़ी इलाकों में चारे के रूप में भी काम आती है। इसके अलावा, तिलहन जैसे सरसों और सोयाबीन की खेती भी होती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।
मिज़ोरम में दलहनों जैसे अरहर, मूँग और राजमा की भी खेती की जाती है। ये फसलें सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत के लिए भी फायदेमंद होती हैं। अदरक और हल्दी जैसी मसालेदार फसलों की भी यहां खेती की जाती हैं, और बात करें अगर मिज़ो मिर्च की तो वहअपनी चटख तीखेपन के लिए मशहूर है। बागवानी के क्षेत्र में, मिज़ोरम के संतरे और अनानास ने अच्छी पहचान बनाई है, खासकर चंपई ज़िले के चुआन्थर संतरे काफी नामी है। बांस और केले के रेशे जैसी नकदी फसलें भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करती हैं।
जब बात होती है भारतीय कृषि के बारे में, तो अक्सर पंजाब, हरियाणा या उत्तर प्रदेश की तरह के बड़े, यांत्रिक खेती वाले राज्यों की चर्चा होती है। लेकिन मिज़ोरम में आज भी एक पुरानी जनजातीय और अनूठी खेती पद्धति मौजूद है—झूम खेती। यह खेती सिर्फ एक तरीका नहीं, बल्कि एक जीवनशैली, सांस्कृतिक धरोहर और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है।
क्या है झूम खेती?
झूम खेती, जिसे अंग्रेज़ी में शिफ्टिंग कल्टिवेशन या स्लैश एण्ड बर्न कल्टिवेशन कहा जाता है, एक पारंपरिक खेती प्रणाली है। इसमें किसान जंगल के पेड़-पौधों को काटकर जलाते हैं, और फिर राख का इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में करते हैं। इसके बाद, किसान उस भूमि पर कुछ सालों तक फसलें उगाते हैं और फिर दूसरी जगह पर चले जाते हैं। यह तरीका भूमि और जंगल को खुद को फिर से पुनर्जीवित करने का मौका देता है।
झूम का सांस्कृतिक महत्व
झूम सिर्फ खेती नहीं है, यह मिज़ो जनजातियों की सामूहिकता, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान का प्रतीक है। यह मिज़ो संस्कृति का अहम हिस्सा है, जो 'Tlawmngaihna' (लावमंगैहना) की भावना पर आधारित है—जिसका मतलब है दूसरों की भलाई के लिए निःस्वार्थ सेवा। चापचरकुट जैसे कृषि उत्सव इस सांस्कृतिक धरोहर को और भी मजबूती से जीवित रखते हैं।
आंकड़ों की नज़र से
मिज़ोरम के कृषि विभाग की रिपोर्ट (2021-22) के अनुसार, लगभग 30,000 हेक्टेयर ज़मीन झूम खेती के तहत थी। हालांकि, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन की वजह से यह क्षेत्र धीरे-धीरे घट रहा है। अगर इसे सही तरीके से प्रबंधित किया जाए, तो झूम खेती एक स्थायी और पर्यावरण के अनुकूल कृषि मॉडल बन सकती है।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से झूम
आमतौर पर झूम को वन विनाश से जोड़ना एक सामान्य सी बात रही है, लेकिन आईसीएआर अनुसंधान परिसर (पूर्वोत्तर) की रिपोर्टों के अनुसार, जब इसे 10–15 वर्षों के पुनरावृत्ति चक्र में किया जाए, तो यह भूमि पुनर्योजन, जैव विविधता संरक्षण और मृदा उर्वरता के संतुलन में सहायक होती है।
सरकारी दृष्टिकोण
झूम खेती को समाप्त करने के बजाय अब सरकारें इसे सुधारने और टिकाऊ बनाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। नीति आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट ने झूम को केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आजीविका आधारित प्रणाली के रूप में देखा, जिसे वैज्ञानिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसके अनुरूप, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) और उत्तर-पूर्व परिषद (NEC) ने झूम प्रभावित इलाकों में बांस आधारित उद्योग, मधुमक्खी पालन और इको-पर्यटन जैसे वैकल्पिक आजीविका स्रोतों को प्रोत्साहन देना शुरू किया है। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) जैसे संस्थान झूम किसानों को जैविक खेती, मिश्रित फसल प्रणाली और जल संरक्षण तकनीकों में प्रशिक्षण देकर इस परंपरा को वैज्ञानिक रूप से मजबूत बना रहे हैं। ये प्रयास झूम को मिटाने के नहीं, बल्कि उसे आधुनिक सोच और तकनीक के साथ पुनर्जीवित करने की कोशिश हैं।
भविष्य की दिशा
झूम खेती का भविष्य उस मॉडल में है, जहां परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल हो। बांस आधारित कृषि, औषधीय पौधों की खेती, एग्रो-फॉरेस्ट्री और डिजिटल मार्केटिंग जैसी तकनीकों से इसे नया जीवन दिया जा सकता है। इससे न केवल मिज़ोरम की पारंपरिक खेती को बचाया जा सकता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भी एक स्थायी रास्ता तैयार किया जा सकता है।
झूम खेती को सिर्फ एक पिछड़ी और अवैज्ञानिक खेती पद्धति समझना गलत होगा। यह मिज़ोरम की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक धरोहर का अहम हिस्सा है। इसे खत्म करने की बजाय समझने और संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि यह हमारे कृषि और पर्यावरणीय विमर्श को नया दृष्टिकोण दे सकें ।

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