कभी-कभी कोई तारीख़ बस यूं ही दर्ज हो जाती है, जैसे किसी पन्ने पर नाम के बिना एक निशान। ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि वह दिन किसी घटना का हो, किसी टूटन या बनावट का हो। कई बार तारीख़ें हमारी स्मृति में सिर्फ इसलिए दर्ज हो जाती हैं क्योंकि हम उस दिन कुछ महसूस कर रहे थे शायद कुछ ऐसा जो पूरी तरह समझ नहीं आया।
तो अगर आज की बात हो भी रही हो, तो भी वह शायद सालों पुरानी बातों का ही शोर-सन्नाटा हो। क्योंकि ज़िंदगी कोई ‘आज’ नहीं होती, वह एक लगातार चलती हुई स्मृति-श्रृंखला है, जिसमें बीता हुआ कल और आने वाला कल एक ही धागे से बंधे होते हैं।
शांति से देखना और देखकर भी ना समझ पाना यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि बहुत गहरी चेतना की निशानी है। शायद इसलिए हमें बार-बार सिखाया गया कि शांति में ही अर्थ छुपे हैं। पर क्या यह सच में हमारी इच्छा है? या यह किसी सोची-समझी सामाजिक प्रणाली का हिस्सा है कि हम शांत रहें, बिना सवाल किए?
देखो, और फिर भी न स्पष्ट हो तो सुनो।पर सुनना हमेशा सुखद नहीं होता। क्योंकि सुनना केवल ध्वनि का प्रवेश नहीं है, यह आत्मा के भीतर उतरने वाली प्रक्रिया है। और अगर आप बिना छानबीन के सबकुछ सुनते हैं, तो वह केवल आपको सूचित नहीं करता वह आपको विषाक्त भी कर सकता है।
क्योंकि मसला यह नहीं कि आप सुन रहे हैं। मसला यह है कि आप क्या सुन रहे हैं, और किसे ?
यही वो बिंदु है जहां "चॉइस" एक भ्रम बन जाता है। हमारे पास विकल्प तो बहुत होते हैं, लेकिन उस कोहरे में जहां सबकुछ धुंधला हो, वहां चुनाव करना भी एक मानसिक युद्ध होता है। और कभी-कभी रेत पे नंगे पाँव चलना, किसी संघर्ष का हिस्सा नहीं बल्कि बस एक ‘जीने की कोशिश’ होती है। क्योंकि किसी को भी दर्द पसंद नहीं होता, पर कभी-कभी वही दर्द ज़िंदा होने का सबूत देता है।
और तब, वही अनकहे दृश्य जिनसे हम हमेशा भागते रहे... हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। और जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि हमें वही दृश्य सबसे पहले देखने होते हैं, जिनसे हम सबसे ज़्यादा डरते हैं।ये सब मिलकर जन्म देते हैं उस आंतरिक संघर्ष को जो न तो पूरी तरह तार्किक होता है, न ही पूरी तरह निजी। समाजशास्त्री 'मैक्स वेबर' ने इसी को 'आइरन केज' कहा था जब ज़िंदगी में हर चीज़ को सिर्फ तर्क और नियमों से देखा जाता है, तो इंसान की भावनाएं, सोच और आज़ादी धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। यह आधुनिक जीवन की सबसे चुप और घातक यातना है।
पर एक दिलचस्प बात यह है कि अगर यह पिंजरा पूरी तरह टूट जाए... अगर हमारी संवेदनाएं, इच्छाएं और विचार किसी सामाजिक मशीनरी के अधीन ना रहें तो दिमाग अनजाने भय से भर जाता है।क्योंकि स्थिरता, चाहे वह बंद कमरे में हो या खुली दुनिया में हमें एक झूठा भरोसा देती है कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में है।
कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानसिक ‘अनरेस्ट ’ को पूरी तरह दबाना आवश्यक नहीं, बल्कि उसे अवलोकन करना ज़्यादा प्रभावी होता है। यही वह स्थिति है जहाँ इंसान अपनी चेतना से गहराई में जुड़ता है। एक ऐसी स्थिति जहाँ दुख भी सुकून में बदल सकता है।
इस संदर्भ में मनोविश्लेषक 'कार्ल जंग' की वह धारणा याद आती है, जिसमें वे कहते हैं, “One does not become enlightened by imagining figures of light, but by making the darkness conscious.” यानी, केवल रोशनी की कल्पना करने से आत्मज्ञान नहीं होता, बल्कि अपने भीतर के अंधेरे को देखने और समझने से होता है।
असल में, दिमाग की भी अपनी बायोलॉजी है; वह हर वक्त कुछ न कुछ सोचता है। उसकी भूख सिर्फ जानकारी की नहीं होती, बल्कि तर्क की, समाधान की और सबसे ज्यादा अस्तित्व के प्रमाण की होती है। और यहीं पर यह सवाल उठता है कि क्या प्रसन्नता ही वास्तविक सुख है ?
प्रसन्नता अच्छी है, लेकिन ...अगर वह सतही हो तो वह बस एक क्षणिक गिलहरी की छलांग है, स्थायित्व नहीं।और दूसरी तरफ चिंता बुरी है, जैसा सब कहते हैं। लेकिन अगर उस चिंता में भी कोई गूढ़ सुकून है...एक धीमी पर सच्ची अनुभूति है, सीख है , मजबूती है तो क्या वह बुरी है?
तारीख़ें फिर से लौट आती हैं...कभी सवाल बनकर, कभी उत्तर की छाया में। और हम, एक लोहे के पिंजरे में कैद होते हुए भी, अपनी संवेदी क्षणों में थोड़ी देर के लिए आज़ाद होने की जुगत में लग जाते हैं।

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