Friday, February 13, 2026

१३ फरवरी की शाम...

अभी ट्रेनिंग चल रही है। कल की ट्रेनिंग पूरी कर मेट्रो ही लिया था कि रूमी का फ़ोन आया कि आज आते वक़्त सब्ज़ियाँ लेते आना।

"ठीक है..." इतना मैंने ना सिर्फ कहा, बल्कि सुना भी। कभी- कभी स्वयं को सुनना आश्चर्य में भी डालता है... कहां पापा के साथ सब्ज़ी लेने जाना होता था । वह जब तक सब्ज़ी लेते तब तक गोलगप्पे और आलू टिक्की निपटाए जाते...क्या मस्त दिन थे। 

ख़ैर... लाजपत मेट्रो स्टेशन से घर तक का रास्ता कानों में ब्लूटूथ डाले पार हो ही रहा था कि सब्ज़ी का ठेला दिखा। एक किलो मटर, आधा किलो से अधिक की गोभी, मम्मी को याद करते हुए पाव भर चुकंदर, क्रयता की परम्परा बनाये रखते थोड़ी सी धनिया।

 ग्राहक को हमेशा लगता है कि धनिये का दाम उसने सब्ज़ियों के दाम में ही चुका दिया है पर हर सब्ज़ीवाले को चुटकी भर धनिया ने दुनिया का सबसे दिलदार आदमी बनने का मौका दिया है और देता रहेगा। यह धनिया ही है जिसकी वजह से सब्ज़ियों को ठेले से लेने की अभिप्रेरणा बनी रहेगी।

कल सड़क पर ना जाने कितने तरीके के शोर थे पर वह सारे शोर सामान्य व परिचित थे। सब्ज़ीवाले ने दाम बताया साफ सुनने के लिए ब्लूटूथ हटाना पड़ा।  यह कैसी आवाज़ जो पीठ से होते हुए कानों में चढ़ रही थी।  हम दोनों साथ मुड़े, ना उसने दाम बताया ना मैंने पूछा।  हमदोनों साथ में एक दिशा में बढ़े। जहाँ जाना हमदोनों को बड़ा गैरज़रूरी लग रहा था पर दोनों गए।

दो बड़े आदमी एक छोटा आदमी ऊँची आवाज में बात करते करते लड़ रहे है...लड़ते-लड़ते बड़े आदमी ने हाथ छोटे आदमी के ऊपर हाथ उठा दिया । हाथ उठाना हमें क्रियाशील बनाने की शायद एक वजह रही हो।  छोटा आदमी सब्ज़ीवाले के ही बिरादरी का था।  अभी इतना ही पता चल पाया था।  वहां सिर्फ बड़ा आदमी चिल्ला रहा था और जब चिल्लाना कम लगने लगे तो वह उसे थप्पड़ मार  रहा था। अब हम दो और वो तीन, कुल पांच लोग थे।  

मुँह से सहसा बात फूटी, "आप मार नहीं सकते। मेरे सामने तो कत्तई नहीं। मैं मीडिया से हूँ।" 

वह आदमी कपड़ो से वकील जान पड़ता था उसने जब बोला - "मैंने थप्पड़ कहा मारा, जाइये  आप अपना काम करिये।" 

और फिर उसने डांटना चालू रखा। तब तक  यह बात तय हो चुकी थी  कि  वह वकील ही है। साथ वाले दूसरे रसूखदार ने बताया कि वो थप्पड़ नहीं मार रहा, वो खिन्न है। खिन्नता का कारण पूछने पर बताया कि हमने इसे कितनी बार  मना किया कि यह पॉश इलाका है, सामने गटेड सोसाइटी है, यहाँ सड़क के किनारे गाड़ियां पार्क होती है। 

 "एमसीडी ने कितनी बार इनको मना किया है... ये मानता ही नहीं है।"  "फिर भी... हाथ  उठाना..." "मैडम चलिए छोड़िये..."

चूँकि मैडम को भी ज्यादे पड़ी नहीं थी तो उन्होंने भी छोड़ दिया। सब्ज़ी के पैसे पे किये। इस बीच सब्ज़ीवाले ने बताया फलां आदमी सुप्रीम कोर्ट में वकील है। और उसका पसंदीदा ग्राहक  भी, वो  सामने वाले कॉलोनी में रहते हैं।  उन्होंने कई बार इसको मना किया है। पर यह भी अड़ियल है।

 "पर... आपने भी तो लगाया है वो आपको तो नहीं बोल रहे।"

 "उनसे कुछ व्यक्तिगत है क्या ?..." 

"नहीं, क्या ही होगा... हालाँकि कि यहाँ ठेले लगाने के लिए पहले पूछना पड़ता है।"

 "अच्छा।" "किससे ?"  

"कॉलोनी वाले लोगो से वो अगर इजाज़त दे तो लगा सकते हैं..." "क्या? सच में ! लेकिन यह सड़क तो कॉलोनी के अंदर नहीं चौराहे पर है ..." "हम्म।" 

"आपको कैसे मिली इजाज़त ?" 

"मेरा परिचय था... एमसीडी का मेन आदमी फला भइया मेरा परिचित हैं।" 

"अच्छा...पैसे भी देने होते हैं ?"

"नहीं नहीं...कोई  पैसा नहीं।" "ओह!!!..."

इतने में सब्जी का थैला आँखों के सामने लटका दिया। थैला थामते एक बार फिर हम दोनों ने उस फल वाले को देखा। वो दोनों उसे धमकाते हुए कॉलोनी के अंदर जाने वाले ही थे पलटकर उसने बोला -

"बात जो भी हो आपने मुझे मारा कैसे ? आप मुझे मार नहीं सकते आपने गलत किया है।" 

"मैंने मारा ही नहीं ... तू अपनी कल दुकान नहीं लगाएगा, लगाई तो फिर बताऊंगा।"  

धीरे धीरे वह आवाज़ मद्धम होते होते गायब हो गई। 

ख़ैर फिर सुबह हुई, ट्रेनिंग की एक और सुबह, रास्ता ऑफिस का वही था। ऑफिस आते वक़्त लाजपत के सड़को पर खड़ी बंद गाड़ियों ने थोड़ी आवाज़ की। अनदेखी की कोशिश में सुप्रीम कोर्ट वाले रस्ते में ट्रैफिक का मिलना अब सामान्य सी बात है। कोर्ट के बाहर सड़क की चौड़ाई अच्छी है तभी तो तमाम गाड़िया सड़कों पर पार्क कर दी जाती हैं बीस तीस मिनट लगते हैं तो क्या जैसे तैसे वह रास्ता भी पार तो हो ही जाता है।  ख़ैर देखो ऑफिस आ गया। अभी फिर पे करना है। अब लिखना बंद करना होगा। 

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