कई दिनों से मन उदास है शायद इसकी वजह कुंतल की कहानी हो जिसे अभी पूरा पढ़ा है। उपन्यास पढ़ते वक़्त बहुत जरूरी होता है यह पता होना की यह कहानी सृजनात्मकता की उपज है या सच्चाई की । चूंकि कांता भारती की गूगल पर और कोई किताब नहीं मिल रही । साहित्य कहता है यह उनके अनुभव हैं और सच हैं । एक बार फिर मन डर जाता है, उदास हो जाता है ।
कांता भारती का उपन्यास “रेत की मछली” हिंदी साहित्य की उस परंपरा से कटकर आता है, जहाँ कहानियाँ मनोरंजन नहीं, जीवन की उघड़ी हुई परतें होती हैं। यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार यह एहसास होता है यह कहानी नहीं लिखी गई थी, यह कहानी थी, जो भीतर से फूट पड़ी। यह वह कथा है जिसे कहा जाना ज़रूरी था, और शायद लंबे समय तक दबा कर रखा गया था।
कुंतल, इस उपन्यास की केंद्रीय नायिका है , वह धीरे-धीरे कब परिधीय हो जाती है यह उसे होने के बाद पता चलता है और यह प्रक्रिया ना सिर्फ उसे बल्कि पाठक वर्ग को द्रवित करता है... कुंतल वह पात्र नहीं है जो आदर्श के खाँचे में फिट होती है। वह उस स्त्री की प्रतिनिधि है जो पढ़ी-लिखी है, समझदार है, प्रेम में विश्वास करती है, पर समय के साथ रिश्तों की असलियत में अपनी अस्मिता तक गँवा देती है। कुंतल की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि उसे धोखा मिला, बल्कि यह है कि उसने खुद से कभी सवाल नहीं किए। वह चुप रही, सहती रही, रिश्तों की दरकती दीवारों के नीचे अपना स्वाभिमान रखकर बैठी रही और धीरे-धीरे खुद को ही खोती चली गई।
लेकिन यह उपन्यास कुंतल को बेबस दिखाकर सहानुभूति कमाने की कोशिश नहीं करता। बल्कि एक कड़वा, ईमानदार सच दिखाता है कि जब तक कोई स्त्री अपने आत्म-सम्मान के लिए नहीं खड़ी होती, तब तक दुनिया हर भावनात्मक ज़ख्म को 'कर्तव्य' का नाम दे ही देती है।
शोभन, इस कथा का सबसे गूढ़ पुरुष पात्र है। एक ऐसा व्यक्ति जो संवेदनशील भी है, और बेईमान भी। उसके भीतर भावनाओं की गहराई भी है, और रिश्तों से खेलने की कायरता भी। किताब में पत्र संवाद के बीच एक पंक्ति है , “अकेलापन अब महसूस होता है..." यानी जब आपने साथ को महसूस किया हो, तभी अकेलेपन की असल तासीर समझ में आती है। यह एक अकेले व्यक्ति की नहीं, छूट गए रिश्तों की सामूहिक तड़प है। लेकिन शोभन की यह उदासी, उसकी संवेदनशीलता उसे पूरी तरह निर्दोष नहीं बनाती, जो कुछ वह करता है वो धोखा है, चाहे वह प्रेम के नाम पर हो या फिर भावनात्मक पलायन के नाम पर।और फिर आती है - मीनल , शायद इस उपन्यास की सबसे कठिन गुत्थी। एक स्त्री, जो स्त्रीत्व को सहानुभूति में नहीं, बल्कि हथियार की तरह इस्तेमाल करती है। उसके भीतर अधूरी इच्छाएँ हैं, असुरक्षा है, और क्रूरता भी। मीनल वह चेहरा है जो एक औरत होकर दूसरी औरत को तोड़ता है। पाठक कभी उसे समझने की कोशिश करता है, कभी उससे नफ़रत करने लगता है, और अंत में, उसके हिस्से घृणा और दया, दोनों ही बचते हैं।
"रेत की मछली" की खास बात यह है कि यह तेज़ गति वाली कथा नहीं है - यह धीमे ज़हर की तरह है। इसका पहला हिस्सा एक लंबी, चुप यात्रा जैसा है, जिसमें पाठक को धैर्य रखना पड़ता है। लेकिन वही धीमापन, वही बुनाई जरूरी थी- क्योंकि यही वह जगह है जहाँ कुंतल की खामोशी गूँजती है। और फिर दूसरे भाग में, जैसे बरसों से दबे हुए सवाल, अहसास और घाव एक-एक करके फटते हैं। “रेत की मछली” एक स्त्री के भीतर की आवाज़ जो अफना कर थक चुकी है, पर अब भी पूरी तरह मरी नहीं है।।
“रेत की मछली” को पढ़ना, दरअसल, एक ऐसा अनुभव है जहाँ पाठक का दिल कई बार भारी, आँखें नाम और कालेजा फटने को होता है। न सिर्फ इसलिए कि कुंतल टूटी है, बल्कि इसलिए भी कि वह टूटती रही और किसी ने रोका नहीं, यहाँ तक कि उसने खुद भी नहीं।
यह उपन्यास साहित्य नहीं, एक स्त्री का बयान-ए-हकीकत है। ऐसा लेखन जो कहता नहीं, बस एक आईना रख देता है और पाठक उसमें अपना ही कोई छिपा चेहरा देख लेता है।
हिंदी साहित्य में ऐसी किताबें कम दिखती हैं, तो इसकी वजह यह नहीं कि ऐसी कहानियाँ नहीं होतीं बल्कि यह है कि अधिकतर स्त्रियाँ अब भी लिखने से पहले टूटने से डरती हैं। कांता भारती ने न सिर्फ लिखा, बल्कि उस
असहनीय चुप्पी को शब्द दिए हैं, लिखने के दौरान उन सारी पीड़ाओं को एक बार फिर से जिया है ...

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